करवा चौथ : व्रत नहीं एक उत्सव

अमिता सिंह

करवा चौथ का त्यौहार भारत में एक उत्सव के तर्ज पर मनाया जाता है | यह त्योहार दीपावली से 9 दिन पहले मनाया जाता है | हिंदू पंचांग के अनुसार करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक मास की चतुर्थी को आता है | इसकी शुरुआत भारतीय संस्कृति में एक व्रत के रूप में हुई थी, लेकिन मौजूदा परिवेश में इसने अपने स्वरूप को बदल लिया है | मात्र कुछ राज्यों से प्रारंभ हुआ यह व्रत रूपी उत्सव आज भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में फैल गया है | आधुनिक काल में करवा चौथ को पति दिवस का भी नाम दिया गया है तथा उस रूप में भी इसे मनाया जाता है | करवा चौथ के व्रत के साथ बाजारों की रौनक एक बार पुनः वापस लौट आई है | विभिन्न बाजारों में महिलाओं को खरीददारी करते हुए देखा जा सकता है |

इस व्रत में हिंदू सुहागन महिलाएं भूखी प्यासी रहकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं | इस व्रत में पूरे विधि विधान से माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा अर्चना की जाती है, तदोपरांत करवा चौथ की कथा सुनी जाती है | यह व्रत रात्रि में चंद्रमा को अर्ध्य देने के बाद समाप्त होता है | कथा सुनना इस व्रत का महत्वपूर्ण पहलू है बिना कथा सुने इस व्रत को अधूरा माना जाता है | हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस व्रत में महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है | पहले के समय में जहां व्रत की तैयारियों में प्राकृतिक सामग्रियों का प्रयोग किया जाता था | वही आज के भागदौड़ के युग में इसका स्थान आर्टिफिशियल सामग्रियों ने ले लिया है | लेकिन हम सबको यह प्रयास करना चाहिए कि यदि आवश्यक ना हो तो आर्टिफिशियल सामग्रियों का प्रयोग इस व्रत में ना किया जाए | इस व्रत में प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग कर महिलाएं भारत सरकार की प्लास्टिक मुक्त पहल में अपना अमूल्य योगदान दे सकती हैं | भारत देश में वैसे तो चौथ माता जी के कई मंदिर स्थित है, लेकिन सबसे प्राचीन एवं सबसे अधिक ख्याति प्राप्त मंदिर राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गाँव में स्थित है | चौथ माता के नाम पर इस गाँव का नाम बरवाड़ा से चौथ का बरवाड़ा पड़ गया | चौथ माता मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने की थी | कथा के महत्व के कारण इस व्रत में बहुत सारी कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से एक यह भी है -
एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी | एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया | स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया | वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा | उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया | मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है | उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ | यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता | इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी | सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी |
इस तरह की अनेकों कहानियां प्रचलित हैं जो इस व्रत के महत्व को बयां करती हैं | लेकिन इस प्रकार के सभी व्रतों से ऊपर मानवता का धर्म है | हम सभी को धर्म के रीति-रिवाजों का पालन करने के साथ-साथ मानवता के धर्म का भी पालन करना चाहिए, सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है | हमें अपने हृदय में हमेशा जानवरों, पशु-पक्षियों और मनुष्य के लिए जाति और संप्रदाय से उठकर बिना किसी भेदभाव के मदद का भाव जगाना चाहिए और हमेशा तत्पर भी रहना चाहिए | यदि हम अपने जीवन में इस तरह के आचरण को स्वीकार कर लेते हैं | तो ईश्वर की कृपा हमेशा हम सब पर बनी रहेगी, विश्व केे सभी धर्मों में इस बात को स्वीकार किया गया है | लेकिन धर्म का भी अपना एक अलग पहलू है उसको भी नकारा नहीं जा सकता |