कुंभ पर्व में स्नान का पौराणिक महत्व

1 अप्रैल से आरम्भ होगा हरिद्वार में इस बार कुंभ पर्व,  इस बार 11 साल के बाद आरम्भ हो रहा है कुंभ पर्व क्योंकि देवगुरू ब्रहस्पति 6 अप्रैल से कुंभ राशि पर स्थित हो जायेंगे सामान्यतः कुंभ पर्व 12 साल बाद होता है
 
 
आगरा: वैदिक सूत्रम चेयरमैन विश्वविख्यात भविष्यवक्ता एवम वास्तुविद पंडित प्रमोद गौतम ने कुंभ पर्व के रहस्यमयी आध्यातिमिक महत्व के तथ्यों के सन्दर्भ में गहराई से बताते हुए कहा कि हिन्दू धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व कुंभ मेला, एक महान पर्व के रूप में भारत देश में आयोजित होता है। कुंभ मेले की भारतीय परम्परा मात्र एक मेले के रूप में नहीं, वरन् उत्सव के रूप में मनायी जाती है। यह एक ऐसा मेला है जहां लोग श्रद्धा के सागर में उपासना की डुबकी लगाते नजर आते हैं। लेकिन आज भी लोग पूर्ण रूप से इस पौराणिक कुंभ मेले की मान्यता, इससे जुड़े इतिहास एवं पौराणिक महत्व को समझ नहीं पाए हैं, इतना ही नहीं, लोग शायद यह भी नहीं जानते कि वास्तव में कितने कुंभ मेले भारतवर्ष में प्रचलित हैं और कितने मनुष्य जाति द्वारा मनाए जाने के लिए अधिकृत हैं। यह एक ऐसा दिव्य पर्व है जो हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। यह कुंभ मेला अपने पौराणिक इतिहास के साथ कुंभ पर्व स्थलों के कारण भी काफी प्रसिद्ध है।आध्यात्मिक देश होने के कारण भारत में कई धार्मिक यज्ञ, मेला आदि समय-समय पर आयोजित होते रहते है। कुंभ पर्व का मेला ही इसी तरह का एक आध्यात्मिक मेला है, जहाँ बहुत विधि-विधान के साथ पूजा पाठ, यज्ञ आदि होता है। ऐसा माना जाता है कि कुंभ पर्व के मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के सारे पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं और वो जीवन-मरण के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त हो जाते है। दिसम्बर 2017 में यूनेस्को ने भारत में आयोजित इस मेले को ‘इनटैन्जिबल कल्चर हेरिटेज ऑफ़ ह्यूमैनिटी लिस्ट’ में शामिल किया है। इस तरह से यह कुंभ मेला एक वैश्विक स्तर का आयोजन बन गया है।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि सनातन धर्म में कुंभ मेले का अपना आध्यात्मिक महत्व है। सदियों से कुंभ पर्व के मेले में स्नान की प्रथा चली आ रही है। सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद उसका पुनर्जन्म होता है। ऐसा माना जाता है कि कुंभ पर्व के मेले में स्नान करने वाले व्यक्ति पूरी तरह जन्म-बंधन से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेते है। इस कुंभ मेले में एक साथ असंख्य हिन्दू श्रद्धालु एक स्थान पर आ पाते हैं। विभिन्न तरह के साधु, सिद्ध पुरुष, विद्वान और पंडित इस कुंभ पर्व के मेले में आकर पूजा पाठ, यज्ञ आदि का आयोजन करते हैं। इस मेले में शामिल होकर आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया जा सकता है। यह अदभुत कुंभ पर्व का मेला प्रत्येक बारह वर्षो के अंतराल में लगता है। इस बारह वर्ष के बीच छः वर्षो में इस मेले का आयोजन ‘अर्द्ध कुंभ ’ के नाम से होता है। इसके आयोजन का सही समय और तिथि धार्मिक रीति रिवाज सभी वैदिक हिन्दू ज्योतिष शास्त्र के आधार पर होता है। साथ ही ये प्रसंग ध्यान देने योग्य है कि इलाहाबाद संगम में प्रत्येक वर्ष माघ के महीने में ‘माघ मेला’ का लगता है। यही मेला छः वर्ष में ‘अर्द्ध कुंभ ’ और पूरे बारह वर्ष में ‘कुंभ मेला’ के रूप में हमारे सामने आता है।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन एस्ट्रोलॉजर पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि भारत में केवल चार ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहां कुंभ मेले का एक बड़े स्तर पर आयोजन किया जाता है। लेकिन केवल चार ही क्यों? चार से कम या ज्यादा क्यों नहीं? और केवल यही चार धार्मिक स्थल क्यों? इनके अलावा किसी अन्य स्थल पर कुंभ मेले का आयोजन करना सही क्यों नहीं माना जाता? इन सभी प्रश्नों का उत्तर कुंभ पर्व मेले के आयोजन से जुड़ी एक पौराणिक कथा पर आधारित है। वैसे तो इस मेले से संबंधित कई पौराणिक एवं लोक प्रचलित कथाएं सुनने में आती हैं, लेकिन सबसे पुरानी एवं मान्यतानुसार सही माने जाने वाली कथा ‘समुद्र मंथन’ से जुड़ी है। कहते हैं यह कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से गिरी अमृत बूंदों से जुड़ी हुई हैं, जिसके कारण ही कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। इस कथा के अनुसार अपने क्रोध का ताप रोक ना पाने वाले महर्षि दुर्वासा ने एक बार देवराज इंद्र एवं अन्य महान देवताओं को शाप दे दिया था। शाप के असर से सभी देवता कमजोर हो गए, जिसके फलस्वरूप दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण करना आरंभ कर दिया। दैत्यों के इस दुष्ट प्रभाव से हताश होकर सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे दैत्यों से छुटकारा पाने के लिए विनती करने लगे। देवताओं की तकलीफ को समझते हुए भगवान विष्णु ने उनसे दैत्यों के साथ मिलकर ही एक कार्य करने को कहा, और यह कार्य था क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने का। आज्ञानुसार संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ मिलकर अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्रपुत्र ‘जयंत’ अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया, क्योंकि यदि यह कलश दैत्यों के हाथ लग जाता तो वह देवताओं की तुलना में और भी शक्तिशाली हो सकते थे। परन्तु दुर्भाग्य से दैत्यों की नज़र उड़ते हुए जयंत पर पड़ गई और दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा करना आरंभ कर दिया। आकाश में उड़ते हुए घोर परिश्रम के पश्चात आखिरकार दैत्यों ने बीच रास्ते में जयंत को पकड़ लिया लेकिन जयंत इतनी आसानी से दैत्यों को कलश देने वाले नहीं थे। दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ, कहते हैं यह युद्ध पूरे 12 दिनों तक चलता रहा। युद्ध के दौरान गलती से कलश में से पवित्र अमृत की चार बूंदें धरती की ओर गिर गई। पहली बूंद प्रयाग में गिरी तो दूसरी शिव की नगरी हरिद्वार में, तीसरी बूंद ने उज्जैन की ओर प्रस्थान किया तो चौथी बूंद नासिक की ओर जा गिरी। यही कारण है कि कुंभ के मेले को इन्हीं चार धार्मिक स्थलों पर मनाया जाता है। कहते हैं उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। इस कलह को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और यथाधिकार सबको अमृत बांटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि इस कथा के अनुसार अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में पूरे बारह दिन तक युद्ध हुआ था, लेकिन पृथ्वी लोक में स्वर्ग लोक का एक दिन एक वर्ष के बराबर माना जाता है। इसलिए कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं। मनुष्य जाति को अन्य आठ कुंभ मनाने का अधिकार नहीं है। यह कुंभ वही मना सकता है जिसमें देवताओं के समान शक्ति एवं यश प्राप्त हो। यही कारण है कि शेष आठ कुंभ केवल देवलोक में ही मनाए जाते हैं।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि कुंभ पर्व मेले में सूर्य एवं बृहस्पति ग्रह का विशेष योगदान माना जाता है इसलिए इनके एक राशि से दूसरे राशि में जाने पर ही कुंभ मेले की तिथि का चयन किया जाता है। वैदिक हिन्दू प्राचीन मान्यतानुसार जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में आता है, तब यह मेला हरिद्वार में मनाया जाता है। परन्तु जब बृहस्पति वृषभ राशि में प्रवेश करता है और सूर्य मकर राशि में होता है, तो कुंभ पर्व का यह उत्सव प्रयाग में मनाया जाता है। इसके अलावा जब बृहस्पति और सूर्य दोनों ही वृश्चिक राशि में प्रवेश करें तो यह मेला उज्जैन में मनाया जाता है। किन्तु जब बृहस्पति और सूर्य सिंह राशि में होते हैं तब यह महान कुंभ पर्व मेला महाराष्ट्र के नासिक में मनाया जाता है। केवल इन स्थानों पर उत्सव मनाने का ही नहीं, बल्कि यहां आकर विभिन्न कार्यों को करने के पीछे भी कई मान्यताएं बनाई गई हैं। वैदिक प्राचीन काल से मान्यता है कि कुंभ मेले के दौरान श्रद्धा भाव सबसे उच्चतम माना जाता है। जो जितनी ज्यादा श्रद्धा भाव से यहां आता है उसकी उतनी ही मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इन मान्यताओं की उत्पत्ति हिन्दू धर्म के विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में उल्लेखित हैं।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि स्कन्द पुराण के अनुसार कुंभ मेले के दौरान भक्ति भाव पूर्वक स्नान करने से जिसकी जो कामना होती है, वह निश्चित रूप से पूर्ण होती है। अग्निपुराण में कुंभ मेले को गौ दान से भी जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि इस दिव्य उत्सव में श्रद्धापूर्वक स्नान करने से वही फल प्राप्त होता है जो करोड़ों गायों का दान करने से मिलता है।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि कुंभ पर्व में स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ जैसा फल मिलता है और मनुष्य सर्वथा पवित्र हो जाता है। पौराणिक मान्यतानुसार अश्वमेध यज्ञ संसार के सभी यज्ञों में सबसे उत्तम यज्ञ माना गया है। इसके अलावा कुंभ मेले में स्नान करने हेतु मोक्ष प्राप्ति का भी फल प्राप्त होना माना गया है। कूर्म पुराण के अनुसार इस उत्सव में स्नान करने से सभी पापों का विनाश होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। यहां स्नान से देवलोक भी प्राप्त होता है। भविष्य पुराण के अनुसार कुंभ पर्व में स्नान के पुण्य स्वरूप स्वर्ग मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इन्हीं सभी मान्यताओं का ही परिणाम है कि कुंभ मेले के दौरान खासतौर से विशेष स्नान तिथियों का आयोजन किया जाता है। मुहूर्त के अनुसार खास शाही स्नान की विशेष तिथियां निकाली जाती हैं जिसके आधार पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुंभ पर्व के स्नान तट पर एकत्रित होते हैं तथा अपने पापों का विसर्जन करते हैं।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने वर्ष 2021 में हरिद्वार में आयोजित होने वाले पूर्ण-कुंभ पर्व मेले के शाही स्नान की मुख्य तिथियों में स्नान करने के महत्व के बारे में बताते हुए कहा कि हमारे वैदिक प्राचीन पौराणिक हिन्दू शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि पर्व काल की विशेष तिथियों पर स्नान करने से ईश्वर की विशेष असीम अनुकम्पा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि वर्ष 2021, में हरिद्वार पूर्ण-कुंभ-पर्व स्नान 1अप्रैल 2021 से शुरू हो रहा है। 12 साल बाद आयोजित होने जा रहा कुंभ-पर्व मेला 1 अप्रैल से 28 अप्रैल 2021 तक आयोजित होगा। 
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि वर्ष 2021 में हरिद्वार में इस बार कुंभ पर्व का आरम्भ वैसे भी 11 साल के बाद हो रहा है। वैसे कुंभ 12 साल बाद होता है। अब से पहले हरिद्वार में आयोजित कुंभ चार माह से अधिक समय का होता रहा है। लेकिन कोविड महामारी के चलते इसे इस बार सीमित कर दिया गया है। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि कुंभ मेला 2021 इस बार एक महीना का नहीं बल्कि 28 दिन का होगा कुंभ पर्व की, एक अप्रैल 2021 से होगी शुरुआत। इस बार मुख्य शाही स्नानों में भी कटौती की गई है।
 
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने हरिद्वार कुंभ स्नान की मुख्य शाही स्नान की तिथियों के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि वर्ष 2021 में हरिद्वार कुंभ मेले में 11 मार्च को महाशिवरात्रि पर्व , 12 अप्रैल को सोमवती अमावस्या, 14 अप्रैल को मेष संक्रांति, 21 अप्रैल को राम नवमी और 27 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा को मुख्य शाही स्नान होंगे।