इरफान की पहचान का परचम पान सिंह तोमर

डा. नाज परवीन


राजस्थान के जयपुर में जन्में इरफान खान ने अभिनय को कैरियर के रूप में चुना। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली में उन्होंने इसके लिए प्रशिक्षण लिया और मुम्बई की दुनिया का रूख किया। एक सफल अभिनेता के रूप में उनकी पहचान हासिल करने के लिए उन्हें संद्यर्ष का लम्बा दौर गुजारना पडा, हांलाकि उनमें प्रतिभा प्रारम्भ से ही कमाल की थी, लेकिन शायद सिनेमा की चका-चौंध ने उसका उपयोग थोडा देर सवेर ही किया। इरफान ने अपना मुश्किल दौर टी.वी. सीरियल चन्द्रकान्ता, चाणक्य, लाल घास से प्रारम्भ किया। सिनेमा में रातोंरात स्टार बनने वाली लिस्ट से थोडा जुदा थे इरफान खान उन्हें कामयाबी, शोहरत का मुकाम हासिल करने में जिन कठिनाइयों का सामना करना पडा वह एक साधारण अभिनेता के लिए सहज नहीं था। कई बार इस जददो जहद में उनके मन की आवाज घर वापसी को भी कहती रही लेकिन उनका जुझारू व्यक्तित्व डटा रहा, लडता रहा और दुनिया को उनकी प्रतिभा पर गर्व होना ही पडा। अभिनव के रूप में उन्होंने हॉलीवुड से बॉलीवुड तक का कामयाब सफर तय किया। दोनों जगह अपनी धाक जमा पाना अकसर एक अभिनेता के रूप में आसान नहीं हो पाता। कहते हैं इरफान खान ने भारत में जितने रूपयं नहीं कमाए, उससे ज्यादा डॉलर कमाए। पीकू, तलवार, जज्बा जैसी फिल्मों में उन्हें सराहा गया, लेकिन पान सिंह तोमर का उनका किरदार सिनेमा में उनकी पहचान का परचम लहराने में सफल रहा।
इरफान खान ने अपने अभिनय से न सिर्फ अपने किरदार को एक अलग पहचान दी अपितु पान सिंह तोमर के व्यक्तित्व को जिस अन्दाज में पर्दे पर निखारा, उससे दुनिया इरफान में ही बीहड के उस जुनूनी किरदार पान सिंह को दुबारा जी पायी। पान सिंह जो कि अपने देश के लिए लडना चाहता था, एक फौजी के रूप में कैसे एक भोले भाले व्यक्ति ने देश रक्षा के लिए आर्मी में सेवा देने के बाद, देश को सीमित साधन के साथ न कोई स्पेशल तैयारी न कोई विशेष सुविधाओं के दम पर नेशनल और इन्टरनेशनल मैडल की सौगात दी, जिस तरह से पर्दे पर उतारा किसी साधारण अभिनेता के लिए वह संभव न था। उनकी आसाधारण प्रतिभा की वजह से दुनिया चम्बल के बीहडों में अपने आत्मसम्मान से जूझ रहे एक डकैत को डकैत नहीं बागी के रूप में जान पायी। उनका फिल्म में संवाद ’बीहड में बागी होत हैं, डकैत बनत हैं पार्लियामेन्ट में.........दशको तक बीहड का दर्द बयां करेगा। कैसे पान सिंह एक सैनिक की सजा भी मजे से लेता और कैसे अपनी भूख को शान्त करने के लिए देश को मैडल वे मैडल दिलाता गया और अन्त में लोभ और लालच और विश्वास की भेट चढ जाता है। उनका अभिनय देश विदेश में खूब पसंद किया गया। मार्च 2012 में रूपहले पर्दे पर आयी पान सिंह तोमर ने ऐसी घूम मचायी कि कई अवार्ड अपने नाम करने में सफल रही। इस फिल्म को डारेक्ट किया था तिग्मांशु धुलिया ने। फिल्म ने 70 मिलियन के बजट में 201.80 मिलियन की कमाई की। फिल्म की स्टोरी चंबल के बीहड और म.प्र. के गांवों में रची बसी, लेकिन पान सिंह के किरदार में जान तो इरफान खान ने डाली। उनका कहना चम्बल में डाकू न है साहेब......बागी बडे भले आदमी हैं.......... जा देश में आरमी छोड सबके सब चोर हैं.....पान सिंह के भोले किरदार को ऐसे दर्शाता है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति जीवन में कुछ गलतियों की भेट चढ जाता है। फिल्म के अन्त में दददा ओ दददा हम उपर आके भी जवाब लेंगे.......हमार जवाब पूरा न भव..........बीहड में दुश्मन खतम हो जात हैं दुश्मनी नाही........। सेना में सूबेदार पान सिहं को पुनः जीवित करने जैसा प्रतीत होता है। इरफान के जान डाल देने वाले अभिनय के कारण ही न केवल पूरी फिल्मी दुनिया के आंखे नम हुई, अपितु भारत का शायद हो कोई शख्स अछूता हो जिसे इरफान खान के अचानक जाने का सदमा न लगा हो। 
इरफान अपने जीवन में भी बहुत बडे योद्धा का रोल को निभाया। 2018 से जंग लड रहे अपनी लम्बी बीमारी से अन्त समय तक लडते रहे। अपने शरीर के भीतर हो रही हलचल को महसूस करते हुए उस जंग को दुनिया के सामने अनवांटेड मेहमान की वार्तालाप छोड़ गये। अपनी मेहनत और लगन की शिददत के बल पर आपनी आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम को पूरा कर दुनिया को अलविदा कह गये। दुनिया अपने ऐसे चहीते अभिनेता की भरपाई शायद ही कभी कर पाये।