गहरी हैं ’क्रमिनल फ्रेंडली ’पुलिसिंग की जडें, शातिर हिस्ट्रीशीटर को बचाने की जुगत में थी पुलिस

हिस्ट्रीशीटर के साथ मुठभेड की कहानी रहती है एक जैसी

मथुरा। कान्हा की नगरी में क्रमिनल फ्रेंडली पुलिसिंग की कहानी पुरानी रही है। डॉक्टर निर्विकल्प अग्रवाल अपहरण कांड के उजार होने के बाद यह जुगलबंदी फिर चर्चा में है। जनपद के थानों के हिस्ट्रीशीटर की पुलिसवालों के साथ गलबहियां चर्चा में रहती हैं। तेल माफिया मनोज का जनपद के एक आला पुलिस अधिकारी के कार्यालय के बारह से आगरा पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाना रहा हो, या यमुनापार के एक हिस्ट्रीशीटर की खातिरदारी का मामला, शहर कोतवाली का एक हिस्ट्रीशीटर तो इन दिनों अपने राजनीतिक रसूख के लिए चर्चा में है।
डॉक्टर निर्विकल्प अग्रवाल अपहरण कांड में शामिल रहे अपहरणकर्ता अनूप कुमार पुत्र जगदीश कुमार निवासी कोलाहार (नौहझील) शातिर बदमाश है। उस पर मथुरा जनपद के आठ थानों में 16 मुकदमे और गौतमबुद्ध नगर के चार थानों में मुकदमे दर्ज हैं। इसके अलावा शामिल अन्य पर भी मुकदमे बताए जा रहे हैं। ऐसे शातिर बदमाश को बचाने के लिए मथुरा पुलिस के अफसरों ने पूरी ताकत झोंक दी।
इस अपहरणकर्ता को वृंदावन पुलिस ने 11 महीने पहले यानि 20 मार्च 2019 में राल मोड़ से पकड़ा था। शातिर बदमाश को बचाने के लिए ताकत झोंकने वाली मथुरा पुलिस के अफसर भी पीछे नहीं रहे। क्योंकि इस अपहरणकांड में वसूली गई मोटी रकम का बंदरबांट जो किया गया। यह तो केवल खुलासा हो गया तो सच सामने आ गया। जांच चली तो आखिरकार बचाने वाली पुलिस को अनूप के खिलाफ मुकदमा दर्ज भी करना पड़ा।
जयगुरुदेव मामले में भी फाइनल रिपोर्ट लगाने वाली मथुरा पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो चुके हैं। इस मामले में भी पुनः विवेचना के आदेश आईजी आगरा जोन ए. सतीश गणेश दे चुके हैं। यह तो बानगी मात्र है कि डॉक्टर अपहरणकांड में मथुरा पुलिस की किरकिरी लखनऊ तक हुई। वृंदावन कोतवाली प्रभारी संजीव कुमार दुबे ने बताया कि अनूप 20 मार्च 2019 को पकड़ा गया था।
थाना बरसाना के एक हिस्ट्रीशीटर ने तो अपनी पत्नी को सराकरी राशन की दुकान का ठेका ही दिलाया दिया। अब किस की मजाल है कि राशन नहीं मिलने पर कोई मुंह खोल सके।
यूपी सहित कई राज्यों में दो सौ से ढाई सौ एफआईआर दर्ज होने के बादवजूद कल्पतरू ग्रुप के कर्ताधर्ता जेएस राणा तक मथुरा पुलिस पहुंच नहीं पाई है। जबकि चुरमुरा परिसर स्थित जेएस राणा के गोदाम से चोरी हो रहे माल की पुलिस को भनक लग जाती है और ट्रैक्टर ट्राली सहित पुलिस चालक को मौके से गिरफ्तार कर लेती है, लेकिन जहां तक पहुंचना चाहिए वहां तक पुलिस नहीं रही है। दूसरे कई मामलों में पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है, बुलियन कारोबारी की परिवार सहित हत्या कर देने का मामला रहा हो, या माता पिता की हत्यारों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष करते करते बेटी राखी की मौत की कहानी, पुलिस जिसे बचाने पर उतर आये उसका कोई बालबांका नहीं कर सका। मार्च 2017 हाइवे क्षेत्र की अमर कालोनी में लुट के बाद बदमाशों ने बनवारी और उसकी पत्नी रविबाला की हत्या कर दी थी। न्याय के लिए लडते लडते बेटी राखी ने भी आत्महत्या कर ली। तीन साल में भी पुलिस मामले का खुलासा नहीं कर सकी है।
वहीं 15 अक्टूबर 2015 को कोसीकला थाना क्षेत्र में केंद्रीय गृह विभाग के इंस्टीट्यूट आॅफ क्रमिनोलाजी एंड फारेंसिक जांच मंे लेक्चरर संकल्प आनंद पत्नी नंदनी आनंद और बेटी रिंदिया के साथ आगरा दिल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस के सामने कूदकर जान दी थी। बच्ची रिंदिया बच गई थी। घटना स्थल से पुलिस को एक सुसाइड नोट भी मिला था। जिसमें संकल्प ने करोडों के लेनदेन और विभागीय अधिकारियों के बढते दबाव को कारण बताया था और 38 लोगों का नाम लिखकर आरोप लगाये थे। एफआईआर तो दर्ज हुई लेकिन इस मामले में अभी तक जांच चल रही है।