नागरिकता संशोधन विधेयक पर पूर्वोत्तर की चिंता जायज

कुलिन्दर सिंह यादव 
(9455003666)
 

राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद अधिनियम बन चुके विवादित नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने देश भर के तमाम हिस्सों खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसक रूप धारण कर लिया है | अधिनियम को लेकर हो रहे विरोध के चलते न केवल पूर्वोत्तर के कई क्षेत्रों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया गया है बल्कि इनकी चपेट में आने से कुछ प्रदर्शनकारियों की मौत भी हुई है | उल्लेखनीय है कि देश भर के अन्य हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शन पूर्वोत्तर के विरोध प्रदर्शनों से कई मायनों में अलग हैं | दरअसल पूर्वोत्तर के राज्य खासकर असम के मूल निवासी इस अधिनियम के कारण अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषायी पहचान को लेकर चिंतित हैं | ऐसे में यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या देश के एक हिस्से में लगी आग को नज़रअंदाज कर हम देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति पर विचार कर सकते हैं |

नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को पूर्वोत्तर के कई राज्य में भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है |हालांकि देश के गृह मंत्री ने स्पष्ट किया है कि जनजातीय बाहुल्य इलाकों को इस अधिनियम से बाहर रखा जाएगा | इस अधिनियम में 31 दिसंबर 2014 से पूर्व बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से आए हुए धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने की बात की गई है | इस अधिनियम से पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों को छूट देने की भी बात की गई है | लेकिन प्रदर्शनकारियों की मांग है कि इस कानून को पूर्वोत्तर से पूरी तरह से वापस लिया जाए | विवादित अधिनियम को लेकर हो रहे प्रदर्शनों ने पूर्वोत्तर के राज्यों मुख्यतः असम को खासा प्रभावित किया है, विरोध प्रदर्शनों के चलते मारे जाने वालों की संख्या 6 तक पहुँच गई है | प्रदर्शन को मद्देनज़र रखते हुए असम और त्रिपुरा के लिये ट्रेन सेवाओं को बंद कर दिया गया है और गुवाहाटी जाने वाली कई उड़ानें रद्द कर दी गई हैं | इसके अलावा पूर्वोत्तर के कई क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएँ भी बंद कर दी गई हैं | प्रदर्शन पर नियंत्रण पाने के लिये सरकार द्वारा भारी मात्रा में सेना और पुलिस बल का प्रयोग किया जा रहा है |

पूर्वोत्तर राज्यों में हो रहे विरोध प्रदर्शन देश के अन्य हिस्सों मुख्यतः दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों से काफी अलग हैं | जहाँ एक ओर दिल्ली में विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह अधिनियम एक धर्म विशेष के खिलाफ है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है | आलोचकों के अनुसार, भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जा सकता | विशेषज्ञों का मानना है कि यह अधिनियम अवैध प्रवासियों को मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में विभाजित कर कानून में धार्मिक भेदभाव को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है, जो कि लंबे समय से चली आ रही धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक लोकनीति के विरुद्ध है | इस मुद्दे से इतर पूर्वोत्तर में विरोध कर रहे प्रदर्शनकारी इस अधिनियम को अपने अस्तित्व पर खतरे के रूप में देख रहे हैं | पूर्वोत्तर राज्यों के मूल निवासियों का मानना है कि इस अधिनियम के माध्यम से सरकार ने उनके साथ विश्वासघात किया है | असम को पूर्वोत्तर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का केंद्र माना जा रहा है और असम में विवाद का मुख्य कारण वर्ष 1985 में हुआ असम समझौता है | दरअसल असम के प्रदर्शनकारी इस अधिनियम को वर्ष 1985 के असम समझौते से पीछे हटने के एक कदम के रूप में देख रहे हैं | पूर्वोत्तर के अधिकांश लोगों को डर है कि यह अधिनियम मुख्य रूप से बांग्लादेश से आने वाले अवैध बंगाली हिंदू प्रवासियों को लाभान्वित करेगा, जो कि बड़ी संख्या में इस क्षेत्र में बसे हुए हैं | इसके अलावा पूर्वोत्तर के प्रदर्शनों का एक अन्य उद्देश्य इस क्षेत्र की संस्कृति को बचाए रखना भी है | पूर्वोत्तर की अपनी भाषाओं पर मंडरा रहा विलुप्ति का खतरा किसी से छिपा नहीं है |

वर्ष 2011 की जनगणना के भाषायी आँकड़े असमिया और बंगाली भाषा के बीच के संघर्ष को स्पष्ट करते हैं | आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 1991 में इस क्षेत्र में असमिया भाषा बोलने वाले लोगों की कुल संख्या लगभग 58 प्रतिशत थी जो कि वर्ष 2011 में घटकर 48 प्रतिशत हो गई, वहीं क्षेत्र में बांग्ला भाषी उसी अवधि में 22 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गए | असम के लोगों को डर है कि यदि बांग्ला भाषी अवैध आप्रवासियों को नागरिकता दे दी जाएगी तो वे स्थानीय लोगों पर अपना वर्चस्व कायम कर लेंगे जैसा कि त्रिपुरा में हुआ जहाँ पूर्वी बंगाल के बंगाली-हिंदू आप्रवासी अब राजनीतिक सत्ता में हैं और वहाँ के आदिवासी हाशिये पर आ गए हैं | असमिया भाषा के अलावा पूर्वोत्तर में बोली जाने वाली अन्य भाषाओं की स्थिति भी कुछ इसी प्रकार की है | यूनेस्को की विलुप्त भाषा संबंधी आँकड़ों पर गौर करें तो ज्ञात होता है कि पूर्वोत्तर में बोली जाने वाली 200 से अधिक भाषाएँ संवेदनशील श्रेणी में हैं | नागरिकता संशोधन अधिनियम के निरस्तीकरण की मांग के अलावा इस क्षेत्र में ‘इनर लाइन परमिट’ (ILP) को पूरे पूर्वोत्तर में लागू करने की मांग भी काफी ज़ोरों पर है |

भारत एक जीवंत लोकतंत्र है और लोकतंत्र में देश के प्रत्येक नागरिक को असहमति दर्ज कराने का पूरा अधिकार होता है | आवश्यक है विभिन्न मुद्दों को लेकर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों की बात धैर्य पूर्वक सुनी जाए और सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए एक वैकल्पिक मार्ग की खोज की जाए, ताकि क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान भी बरकरार रहे और अन्य देशों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को एक नया जीवन प्रारंभ करने का अवसर मिल सके | साथ ही यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों का धार्मिक आधार पर विभाजन किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता |