दबगंई: आगरा की खादी पर खाकी के सिंघम हुए भारी

-माननीय एसएसपी से दो बार कर चुके हैं इंस्पेक्टर को हटाने की शिकायत
-इंस्पेक्टर बीस दिन हटने के बाद दोबारा पहुंच गये उसी थाने पर


आगरा। अक्सर फिल्मों में दिखाया जाता है कि नेता किसी पुलिस आॅफिसर से लड़ाई मान ले तो वह उसे बर्बाद कर देता है, लेकिन कुछ ईमानदारी के पुतले होते हैं, उन्हे खरीदना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। भाजपा सरकार में आगरा की पुलिस और राजनेताओं में फिल्मी माहौल चल रहा है। नेता बीसियों साल बाद पूर्णत: सत्ता में आये हैं, तो वह थानों को मनमर्जी चलाना चाहते हैं, लेकिन पढ़ी-लिखी पुलिस होशियार है। वह खुद की और नेता की हैसियत का आंकलन करना अच्छी तरह से जानती है। यही वजह है कि जिले के कई थाना इंचार्ज अपनी शर्तो पर काम कर रहे हैं। वह सत्ताधारियों की हां में हां मिलाने से तत्काल मना कर देते हैं। ऐसा ही एक मामला देहात के थाना क्षेत्र का है। माननीय ने थाना इंचार्ज को हटाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।

संजय प्लेस स्थित एक होटल में चार दिन पहले संघ के एक बड़े पदाधिकारी की पार्टी का आयोजन था। वहां सत्ता दल के कई दिग्गज नेता, संघ के पदाधिकारी और हिन्दूवादी नेता भी मौजूद थे। देहात क्षेत्र के माननीय संघ के नेता से दुखड़ा रो रहे थे कि पुलिस नेताओं की सुन नहीं रही है। हाईकमान ने बंदूक तो दी है, लेकिन कारतूस नहीं दिये हैं। कार्यकर्ता दुखी है। खुद के काम होना भी मुश्किल हो रहा है। नेता सिर्फ उद्घाटन और योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए ही रह गये हैं। माननीन ने खुद पर बीत रहे कई मामले वहां शेयर किये। जिसमें एक पश्चिमी आगरा के एक थाना इंचार्ज की दबगई का जिक्र भी किया। वहां मौजूद वरिष्ठ हिन्दूवादी नेताओं ने बताया कि कुछ समय पहले इंस्पेक्टर ने माननीय के एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया।

इंस्पेक्टर और माननीय में हुई बहस
उसे छुड़वाने के लिए माननीय ने फोन किया। इंस्पेक्टर ने जो सही था वह बता दिया और उसे छोड़ने से इंकार कर दिया। यह बात माननीय को हजम नहीं हुई वह तुरंत थाने में पहुंच गये। वहां काभी देर गहमा-गहमी हुई लेकिन बात नहीं बनी। माननीय तो सपा और बसपा का शासन देख चुके हैं। उनके गुर्गो ने उन्हे उकसाया कि क्या? नेताजी इससे अच्छा तो सपा शासन था कार्यकर्ता के पहुंचने पर इंस्पेक्टर कुर्सी छोड़कर खड़े हो जाते थे। माननीय ताव में आ गये एक बार फिर उन्होंने इंस्पेक्टर को हड़काने के लिए आलाधिकारियों को फोन मिलाया। हालांकि माननीय को वहां से भी सफलता नहीं मिली। माननीय इंस्पेक्टर को हटवाने की चेतावनी देकर थाने से लौट गये।
 
महिला नेत्री की लगा दी क्लॉस
दो साल पहले उसी क्षेत्र की एक युवा नेत्री पुलिस से अभद्रता के मामले में सुर्खियों में आई थी। दरोगा पर हाथ पकड़कर छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया था। पुलिस ने नेत्री की गाड़ी वीआईपी काफिले में घुसने पर रोक ली थी। एक बार फिर नेत्री का भाई कुछ समय पहले इंस्पेक्टर के हत्थे चढ़ गया। महिला नेत्री ने थाने में हंगामा काटा तो इंस्पेक्टर ने सभी के सामने आड़े हाथ लेकर क्लॉस लगा दी थी। नेत्री ने भी शिकायत माननीय से जाकर की, लेकिन वह वह चाहकर भी कुछ नहीं बोल सके। ऐसा ही एक मामला फिर हो गया। माननीय का एक समर्थक और इंस्पेक्टर की पकड़ में आ गया। उसे भी छुड़वाने के लिए माननीय ने फोन मिलाया। इस बार तो इंस्पेक्टर ने यह तक कह दिया कि गलत व्यक्ति को तो में लखनऊ से फोन आयेगा तब भी नहीं छोड़ूंगा।

...तुम तो दल बदलू हो
उसी थाना क्षेत्र में बड़े सत्ताधारी के सजातीय नेता ने पुलिस से अभद्रता कर दी। इंस्पेक्टर उसे थाने ले गये। युवक ने बताया कि फ्लां नेताजी उसके चाचा हैं। वह सालों से राजनीति में सत्ता पक्ष में अहम भूमिका में रहते हैं। बताया गया कि युवक ने बदतमीजी की तो दबंग इंस्पेक्टर ने युवक को पुलिस की भाषा में समझाया और हवालात में बंद कर दिया। गुस्से में तिलमिलाये बड़े माननीय आगरा से सीधे रात में ही थाने में पहुंच गये। इंस्पेक्टर को अच्छे-बुरे लहजे में हड़काया। हालांकि इंस्पेक्टर ने कहा कि वह अपनी उम्र के 60 साल तक पुलिस में ही रहेगा। आपकी तरह दल बदलू नहीं हूं। दोनों माननीय ने  इंस्पेक्टर को हटवाने का भरकस प्रयास कर लिया। पहले वाले माननीय तो दो बार खुद एसएसपी से मिल चुके हैं। उन्होंने भी कहकर टाल दिया कि दिखवाता हूं आप परेशान न हों।

इंस्पेक्टर की आम पब्लिक कर रही है तारीफ
दैनिक ‘अग्र भारत’ ने इस इंस्पेक्टर की सत्यता जानने के लिए कस्बा में कुछेक आम लोग और व्यापारियों से बात की तो निकलकर आया कि इंस्पेक्टर कड़क है। छोड़ा-बड़ा कोई भी चला जाये सभी की बिना सिफारिश के सुनी जाती है। कोई गलत है तो वह सिफारिश नहीं मानते हैं। क्षेत्र में अलग-अलग तरह की चर्चा हैं कि इंस्पेक्टर पर पश्चिमी यूपी के बड़े नेता का हाथ है। कुछ कहते हैं कि पुरानी एसएसपी का खास है। वहीं यही भी बातें होती हैं कि पुलिस में किसी को 100 प्रतिशत ईमानदारी नहीं कह सकते लेकिन इंस्पेक्टर आटे में नमक वाला हैं। थाने में बिना सिफारिश वाले की पहले सुनी जाती है।  वहीं क्षेत्रिय अखबारों के प्रतिनिधि भी इंस्पेक्टर के पक्ष में खड़े दिखाई दिये।