सफेद मोतिया के इलाज में क्रांतिकारी परिवर्तन फेमटोसेकेंड लेजर

 
आगरा   चिकित्सा विज्ञान आए दिन निरंतरता नए-नए आविष्कार करता रहता है और हर बार चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ नया ही सामने लाने में लगा हुआ है. ऐसी बीमारियां जिनका कोई इलाज नहीं था और ऐसे रोगों से अपने परिजनों को लड़ता हुआ देखकर सिर्फ आंसू ही बहाए जा सकते थे, आज चिकित्सा विज्ञान ने न केवल उनका निदान ढूंढ़ लिया है बल्कि उन्हें सामान्य रोग बना दिया है. 
 
आज भी मोतियाबिंद ही दुनिया भर में नेत्रहीनता का सबसे बड़ा कारण है लेकिन नेत्र चिकित्सा के  क्षेत्र में जो प्रगति हुई है उसने कम से कम इसे आतंक फैलाने वाला रोग तो नहीं ही रहने दिया है. आज के दिन भारत में 90 लाख लोग सफेद मोतिया के शिकार हैं और तीन करोड़ 20 लाख लोग ऐसे हैं जिनकी दृष्टि को सफेद मोतिया ने धुंधला कर रखा है. 
 
वैसे तो इस क्षेत्र में निरंतर रूप से ही बदलाव होते जा रहे हैं लेकिन पिछले दो वर्षों के दौरान सफेद मोतिया की शल्य चिकित्सा से संबंधित एक और क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है, जिसने मरीजों के इलाज को और भी सरल और सटीक बना दिया है. यह क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आया है फेमटोसेकेंड लेजर. 
 
 आगरा स्थित सेंटर फॉर साईट के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ धर्मेंद्र नाथ  का कहना है कि इस लेजर तकनीक ने सफेद मोतिया के इलाज में मानवीय पक्ष को एक हद तक समाप्त कर दिया है और इस संपूर्ण प्रक्रिया को ही पूर्व-नियोजित, यांत्रिक और माइक्रोन स्तर तक भी नियमित कर दिया है. फेमटोसेकेंड लेजर प्रौद्योगिकी के अंतर्गत आंखों की एक उच्च विभेदन (रिजॉल्यूशन)वाली छवि निर्मित होती है जो लेजर के लिए मार्गदर्शन देने का काम करती है. इसके परिणामस्वरूप कॉर्निया से संबंधित छेदन पूर्व नियोजित हो पाते हैं और लेजर सटीक पूर्वगामिता के साथ उनके संबंध में निर्णय करता है. अग्रवर्ती लेंस कैप्सूल, जिसे कैप्सूलोरेक्सिस कहा जाता है, उसमें एक सुकेंद्रित, अनुकूलतम आकार का मामूली सा छिद्र किया जाता है और फिर लेंस को लेजर किरणों का इस्तेमाल करते हुुए नरम और द्रवित कर दिया जाता है. इसके पश्चात लेंस को छोटे कणों में तोड़ डाला जाता है. 
 
शल्य चिकित्सक को इस नई प्रक्रिया का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि उसे लेंस को तराशने और काटने जैसे तकनीकी रूप से कठिन कदम नहीं उठाने पड़ते जिनकी वजह से जटिलताएं पैदा हो सकती थीं. इसमें फेको-एमलसिफिकेशन ऊर्जा को 43 प्रतिशत कम कर दिया जाता है और फेको-समय को 51 प्रतिशत घटाया जाता है. इससे संपूर्ण ज्वलनशीलता में कमी आती है और आंखों के पहले वाली स्थिति में लौटने की प्रक्रिया में तेजी आ जाती है. जख्म की स्थिर संरचना संक्रमण दर को भी न्यूनतम कर देती है. देखा जाए तो यह बेहतर परिणाम देता है क्योंकि सर्जरी की प्रक्रिया स्पष्ट और सटीक होती है. 
 
डॉ धर्मेंद्र नाथ  का कहना है कि सफेद मोतिया के इलाज की इस नवीनतम प्रौद्योगिकी के माध्यम से हासिल होने वाला एक अन्य महवपूर्ण लाभ यह भी है कि यह प्रीमियम आईओएल जैसे अनुकूलित (क्रिस्टैलेंस) एवं बहुकेंद्रीय लेंसों के साथ और भी बेहतर परिणाम देता है. स्पष्ट लेजर तकनीक के साथ इन लेंसों से मिलने वाली कुल दृष्टि का स्तर बेहतर हो जाता है. इसके अलावा दृष्टिवैषम्य जैसी पहले से ही मौजूद आंखों की समस्याओं का सामना एलआरआई अथवा लिंबल रिलैक्सिंग इंसिजंस के सुनियोजन के सहारे किया जा सकता है. इससे यह संपूर्ण सर्जरी, मरीज की जरूरतों को पूरा करने की दृष्टि से अनुकूल हो जाती है और उसे सर्वोत्तम दृष्टि प्रदान करती है. 
 
इस संपूर्ण रूप से लेजर प्रक्रिया के इस्तेमाल के माध्यम से जख्म तेजी से भरते हैं, बेहतर दृष्टि क्षमता हासिल होती है, संक्रमण एवं अन्य जटिलताओं के पैदा होने का खतरा नहीं के बराबर होता है तथा जख्म की संरचना स्थिर रहा करती है. इसके अलावा इससे, आईओएल को स्पष्ट रूप से प्रवेश कराए जाने, दृष्टिवैषम्य जैसे पहले से ही मौजूद नेत्र समस्याओं में सुधार और प्रत्येक मरीज के सुगमता से स्वस्थ होने के फायदे हैं. यही कारण है कि दुनिया भर में जहां कहीं भी सफेद मोतिया के इलाज के लिए फेमटोसेेकेंड लेजर को आजमाया गया है, उसे नेत्र चिकित्सकों के साथ-साथ मोतियाबिंद से पीड़ित मरीजों का भी जोरदार समर्थन हासिल हुआ है.