एमवीडीए को चाहिए तेज तर्रार ‘कप्तान’

-एमवीडीए में कांपाउंडिंग की 8 हजार फाइलें लंबित
-शपथ पत्र देने के बाद मनमानी करते रहते हैं निर्माणकर्ता
-पुलिस को मिला अवैध निर्माणों में हस्तक्षेप का अधिकार
 
 मथुरा। एमवीडीए में 800 से अधिक कंपाउंडिंग की फाइलें लंबित पड़ी हैं। नये नोटिसों पर काम करने का विभाग के पास समय नहीं है। यहां तक कि मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद मशानी चौराहे से गौकुल रैस्टोरेंट तक बने 27 मैरिजहोम, होटलों को नोटिस किये गये थे, नोटिस को छह महीने बीत जाने के बाद भी इन पर फीड बैक नहीं लिया गया है। संसाधनों की कमी से जूझ रहा एमवीडीए खुद एनजीटी और कोर्ट के आदेशों के पालन में उलझी हुई है। पुराने नोटिसों पर भी किसी तरह की कार्यवाही नहीं हो रही है। 
कंपाउंडिंग प्रक्रिया मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सौने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गई है। नोटिस जारी करने के बाद वर्षों तक उन नोटिसों पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। हजारों की संख्या में इस तरह की फाइलें एमवीडीए में लंबित पड़ी हैं। एमवीडीए की उपाध्यक्ष समीर वर्मा भी इस बात से बखूबी वाकिफ हैं, इससे पहले तैनात रहे उपाध्यक्ष इसके लिए संसाधनों की कमी का रोना रोते रहे। समीर वर्मा पर नगर आयुक्त का अतिरिक्त भार भी है। इसके अलावा नियमित और पूर्ण कालिक सचिव का नहीं होना भी फायलों का निस्तारण नहीं हो पाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। फाइलों के निस्तारण और उन पर कार्यवाही के लिए स्टाफ का होना भी जरूरी है।
शहर में क्वालिटी चौराहा, भैंस बहोरा सहित कई जगहों पर मनमाने तरीके से निर्माण कराये गये हैं। हाल ही में मसानी चौराहा से हाईवे स्थित गोकुल रैस्टोरेंट तक बने 27 होटलों और मैरिजहोम को पार्किंग को लेकर नोटिस जारी किये गया थे लेकिन इन नोटिसों पर किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं हुई है। करीब दस महीने पहले मुख्यमंत्री कार्यालय से संज्ञान लिये जाने के बाद जिला प्रशासन ने एडीएम वित्त एवं राजस्व रविंद्र कुमार के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया था। इस टीम ने भी अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, उस रिपोर्ट पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई। करीब चार महीने पहले तत्कालीन एमवीडीए उपाध्यक्ष ने जांच के आदेश दिये थे। इसके बाद नोटिस जारी किये गये। इस तरह की प्रक्रियाएं सतत जारी रहती हैं लेकिन उन पर कार्यवाही कभी नहीं होती।  
कंपाउंडिंग के समय बिल्डर द्वारा खुद तोड़ने या प्राधिकरण से अपने खर्चे पर तुड़वाने का जो एफिडेविट दिया जाता है, उन शपथपत्रों पर प्रवर्तन की कार्यवाही नहीं हो रही है। इससे एमवीडीए का रुआब भी कम हो रहा है। वतार्मान में कंपाउंडिग की कार्यवाही नहीं हो रही है। फाइलें भी नहीं आ रही हैं। कंपाउंडिंग में एक महीने का शपथपत्र लगता है। इस तरह की फाइलों की संख्या बहुत अधिक है। कांपाउंडिंग में अपने खुद व्यक्ति को अपना अवैध निर्माण ध्वस्त करना होता है या फिर एमवीडीए उसी के खर्चे पर ध्वस्तीकरण कराता है।